Friday, December 23, 2011

Beyond the limitations of religion: Muslim child Akbar raised by a Hindu tea vendor Aikulal Sandil (Episode 69, 70 on 23rd, 24th Dec 2011)



किशनदास, एक 34-35 साल का लखनऊ के केसरबाग़ इलाके का एक चाय वाला जिसको इमरान अपनी चाय की दूकान के पास बहुत ही बुरी हालत में मिलाता है. जब तीन साल का इमरान मिला था उस समय उसके तेज बुखार था. उसको डॉक्टर के पास ले जाने पर पता चला की उसको पीलिया है और बच्चे के पास बहुत कम वक़्त है अगर उसका इलाज तुरंत न शुरू किया गया तो.

डॉक्टर के कहने पर किशन इमरान को पास के अस्पताल ले जाता है और भर्ती करता है. डॉक्टर उसको कुछ दावा लाने को कहते हैं किशनदास अपने पैसो से दावा लेकर आता है. डॉक्टरों की कोशिशों के बाद इमरान की जान बचाई जाती है. उसके बाद आसपास के लोगों को कहने पर किशनदास इमरान के लावारिस पाए जाने की खबर पुलिस स्टेशन में देता है और बताता है की इस बच्चे को सिर्फ अपना नाम याद था 'इमरान' उसके अलावा कुछ नहीं बता पाया. पिता का नाम पूछने पर उसके मुह से 'अब्बू' ही निकला.

पुलिस कोशिश करती है आसपास के सारे एरिया में इमरान की फोटो से उसका पता लगाने में मगर कुछ नहीं मिलता है. किशनदास परेशान है की इमरान के माँ-बाप अगर नहीं मिले तो इस बच्चे का क्या होगा. किशनदास खुद भी पास की मस्जिद और मदरसे में जाकर एक तीन साल के बच्चे के गुमशुदा होने की खबर देता है मगर बच्चे के माँ-बाप के बारे में कुछ पता नहीं चल पता. सब उसको ये राय देते हैं की वो इमरान को लखनऊ के किसी अनाथालय में सौंप दे. किशनदास दुविधा में है की क्या करे. आखिरकार वो इमरान को अपने ही साथ रख लेता है. लोग उसे सनकी और बेवकूफ कहते हैं. इतनी मेहेंगाई के समय में जब किशनदास के लिए एक चाय की दूकान से अपना खर्चा निकालना मुश्किल है, ऐसे में वो एक बच्चे को कैसे पालेगा?

किशनदास इमरान का स्कूल में दाखिला भी कराता है और उसके बाद एक अजीबोगरीब फैसला लेता है की वो इमरान को इस्लाम की तालीम भी दिलवाएगा. चूँकि इमरान एक मुस्लिम है तो उसे उसके धर्म से वंचित रखना बिलकुल भी ठीक नहीं है. लोग उसको समझाते है की ये सही नहीं है, एक मुस्लिम बच्चे को पालना ही बहुत है और उसे इस्लाम की तालीम दिलवाना सही नहीं होगा मगर किशनदास उसे पास की मस्जिद में ले जाकर वहां की मौलवी साहब से मिलवा कर इस्लाम की शिक्षा दिलवाने की बात करता है. मौलवी साहब को बहुत अच्छा लगता है और वो भी किशन से ये वादा लेते हैं की किशनदास भी इमरान को भगवत गीता पढ़ायेगा.

दिन, हफ्ते, साल गुज़रते हैं. पुलिस इमरान के माता-पिता का पता लगाने में असमर्थ है. हिन्दू बाप और मुस्लिम बेटे की ये कहानी धीरे धीरे सार्वजनिक होती जाती है. लोग उन दोनों को जानने लगते हैं. मगर इस कहानी में पांच साल बाद अचानक मोड़ तब आता है जब इन दोनों का एक इंटरव्यू एक न्यूज़ चैनल पे दिखाया जाता है.

ये कहानी लखनऊ निवासी,बारादरी के एक चायवाले एकूलाल सांदिल की है. एकुलाल को अकबर अपनी दुकान के पास मिला था. उस समय अकबर की उम्र छः साल के आसपास थी. अकबर उस समय बहुत गुमसुम हालत में था और रो रहा था. डॉक्टर के पास के जाने आर पता चला की उसका लीवर कमजोर है, फेफड़ों में इन्फेक्शन है और पैरों में भी इन्फेक्शन है जिसकी वजह से वो चल नहीं पा रहा था. एकुलाल की पडोसी कुसुमावती का भी अकबर के पालन पोषण में बड़ा हाथ रहा.

"हम इसको जैसे ही घर लेकर आये इसने रोना शुरू कर दिया. उसने अपना नाम अकबर बताया और जब ये पूछा की वो कहाँ रहता है, उसने कहा की वो पान दरीबा में रहता है."

कुसुमावती के पांच बच्चे हैं. और वो अकबर का पालन पोषण एक पालक माँ की तरह करती है.

”मै इसको डॉक्टर के पास ले गई और मैंने इसकी मसाज़ भी करी. मुझे लग रहा था की इसका हाथ टूटा हुआ है सो मै इसको इलाज के लिए इटोंजा ले गई “

एकूलाल की खुद की कहानी भी अकबर से मिलती जुलती है. एकुलाल का पालनपोषण भी एक मुस्लिम के द्वारा ही किया गया था.


"मै एक हिन्दू हूँ जिसका पालनपोषण एक मुस्लिम के द्वारा किए गया था. जब मुझे अकबर मिला तो मुझे लगा की अब भगवन मुझसे कह रहे हैं कि अब मेरी बारी है की मै अपने पालक पिता का क़र्ज़ उतारूँ. मुझे कभी भी धर्म बदलने को मजबूर नहीं किया गया तो अब मेरी ज़िम्मेदारी है की मै भी इस बच्चे की ऐसे ही देखभाल करू” - एकूलाल.

एकूलाल को चौधरी मुजतबा हुसैन ने पालपोस के बड़ा किया था जो की एक सरकारी कर्मचारी थे और लखनऊ की एतिहासिक बारादरी की देखभाल करना उनकी ज़िम्मेदारी में था. मुजतबा हुसैन ने एकूलाल को इंगलिश, हिंदी और उर्दू लिखाना व पढना सिखाया. एकूलाल खुद तो कभी स्कूल नहीं जा पाए मगर वो नहीं चाहते थे की अकबर के साथ भी ऐसा ही हो इसलिए उन्होंने अपनी कम आय होने के बावजूद अकबर को पढ़ने की ज़िम्मेदारी ली.

"मैंने एकूलाल को तभी से अब्बू के साथ देखा है जब में काफी छोटा था"- चौधरी हसन इमाम, मुजतबा हुसैन के पुत्र।

"अकबर ने प्रार्थमिक विद्यालय, रिफ्यूजी कैंप से पानी शिक्षा शुरू की उसके बाद वो क्वीनस इंटर कॉलेज में आ गया और अब वो मुमताज इंटर कॉलेज, अमीनाबाद में है. मेरी आमदनी बहुत ज्यादा नहीं है मगर मेरी ये कोशिश है की अकबर की स्कूल फीस कभी भी कम न पड़े. " - एकूलाल

अकबर हर शुक्रवार मस्जिद ज़रूर जाता है. "अभी नमाज़ तो याद नहीं है मगर में जुमे के जुमे मस्जिद ज़रूर जाता हूँ "- अकबर

एकूलाल को अकबर 2002 में मिला था जब की अकबर के माँ-बाप का पता 2007 में चला जब एक न्यूज़ चैनल पर इन दोनों का इंटरव्यू दिखाया जा रहा था. ये इंटरव्यू एक राजनैतिक पार्टी के कैसरबाग ऑफिस में हुआ था.

2002 में छः साल का अकबर उस समय गायब हो गया जब वो अपने पिता के साथ एक शराब की दूकान पर गया था. नशे में धुत पिता घर वापस आते वक़्त उसको दुकान पर ही भूल आये. अकबर के माता-पिता इलाहबाद में रहते हैं और अकबर इलाहबाद में गुम हुआ था जब की उसको लखनऊ में पाया गया. सबसे अजीब बात ये है की अकबर के गुमशुदा होने के बाद उसके माँ-पिता ने पुलिस में उसकी गुमशुदगी की कोई रिपोर्ट नहीं दर्ज कराई जिसकी वजह से एकूलाल भी अकबर के माँ-बाप को ढूँढने में असमर्थ रहा और इसके बाद उसका दाखिल एक स्कूल में करा दिया. बच्चे का नाम नहीं बदला, वही रखा न की धर्म बदला और इस बच्चे को अपने जीवन का एक मकसद बना कर ये निर्णय लिया की वो शादी नहीं करेगा.

जब अकबर के असली माँ-बाप को अकबर के बारे में पता चला तो उन्होंने अकबर की कस्टडी की मांग की मगर एकूलाल ने मन कर दिया क्यूँ की अकबर एकूलाल को चूर कर कहीं नहीं जाना चाहता था. अकबर के माँ बाप ने एकूलाल पर केस किया की एकूलाल ने अकबर को एक बंधुआ मजदूर की तरह रखा हुआ है. ये मामला 2002 में इलाहबाद हाईकोर्ट में जस्टिस बरकत अली जैदी की अदालत में सुनवाई के लिए आया.

न्यायमूर्ति ने ये आदेश दिया की अकबर एकूलाल के साथ ही रहेगा. बच्चे की माँ का तर्क की बच्चा बंधुआ मजदूर की तरह से रखा गया है, कोर्ट ने सिरे से नकार दिया. उन्होंने अकबर की मार्कशीट पर गौर किया. अकबर की मार्कशीट अच्छी थी और उसके स्कूल में अच्छे नंबर आ रहे थे.

जस्टिस बरकत अली जैदी का कहना था, "अपना देश के धर्मनिरपेक्ष देश है. जाति -धर्म की बातों को न्याय के रस्ते में नहीं आने देना चाहिए. जब अंतर जातीय विवाह हो सकते हैं तो तो अंतर-जातीय या अंतर-धर्म पिता-पुत्र भी हो सकते हैं. "
Allahabad high court appoval

मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला भी एकूलाल के पक्ष में ही आया. जस्टिस डी के जैन और एच एल दत्तु की बेंच ने अकबर की जैविक माँ शेहनाज़ से ये सवाल पूछा की जब अकबर के पिता उसको शराब की दूकान पर भूल आये थे और जब अकबर गुम हुआ था उस समय उसकी गुमशुदगी की रिपोर्ट क्यों नहीं लिखवाई गई? कानूनन अकबर की कस्टडी उसकी माँ को दी जा सकती थी क्यों की इसने कम उम्र के बच्चे की स्वाभाविक गार्जियन उसकी माँ ही होती है मगर बच्चे की मर्ज़ी जानना भी ज़रूरी है, और इस मामले में बच्चा अपने पालक पिता को छोड़ कर नहीं जाना चाहता.

सन 2002 में ऐकूलाल और अकबर को दिल्ली के के एक त्यौहार "फूल वालों की सैर" में पुरस्कृत भी किया गया। "फूल वालों की सैर" एक मुग़ल बादशाह द्वारा शुरू किया गया त्यौहार है। इस त्यौहार को इस्लाम को हिन्दुओं के बीच भी प्रसिद्द करने के लिए शुरू किया गया था। एक प्रसिद्द कहानी के अनुसार मुग़ल बादशाह अपने हिन्दू कर्मचारियों को इसमें आमंत्रित करता था और उनको एक पंखे के आकार की चादर और फूल उसे देता था जिसको वो हिन्दू अपनी देवी योगमाया के मंदिर में ले जाते थे. ये त्यौहार हिन्दू-मुस्लिम की एकता के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है जिसमे एकूलाल और अकबर विशेष आकर्षण के केंद्र थे.

धन्य है हमारा देश जहाँ आज के समय में जातिवाद और धर्मवाद के बीच एकूलाल ने इन सब विषम परिस्थितियों से हट कर अपने आप में एक मिसाल कायम की है।

YouTube:
Part 1: http://youtu.be/3FhrvjfEsKE
Part 2: http://youtu.be/gE_66plBVvE
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